होली : सत्य की विजय और जीवन के रंगों का उत्सव – प्रदीप ढेडिया

होली का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह त्योहार परंपरा, प्रेम, और आपसी सद्भाव का प्रतीक बनकर हमारे जीवन में रंगों और आनंद का संचार करता है। यह अवसर हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर की गंदगी को दूर करें और एक दूसरे के प्रति सद्भावना एवं भाईचारे की भावना को मन में संजोएं। प्रदूषण और नकारात्मकता के बावजूद, जीवन में होली के रंग कभी फीके नहीं पड़ने चाहिए, क्योंकि यह पर्व हमें अपने भीतर के सत्य को पहचानने और उसे दूसरों तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करता है।

यद्यपि आधुनिक जीवन की भागदौड़, “मेरे-तेरे” की भावना, और जटिलताओं ने होली के स्वरूप को प्रभावित किया है, फिर भी यह पर्व अपने मूल उद्देश्य, आनंद और मस्ती की भावना को बनाए रखते हुए, हमारे भीतर सकारात्मकता और खुशियों का संचार करता है। यह पर्व न केवल मन, बल्कि वातावरण को भी उज्जवल और आनंदमयी बनाता है।

होली के त्योहार में पारंपरिक क्रीड़ाओं का आयोजन किया जाता है। बच्चों द्वारा लकड़ियों और कंडों से होलिका का ढेर लगाना, उसके बाद होलिका का पूजन और उसकी आग में जलने की प्रक्रिया, यह सब विशेष सांस्कृतिक गतिविधियाँ हैं। होलिका-दहन का मतलब है कि असत्य और पाप का नाश होता है, और सत्य एवं पुण्य की विजय होती है। प्रह्लाद और होलिका की कथा भी इस पर्व की महिमा को बढ़ाती है, जहां भगवान की कृपा से भक्त प्रह्लाद की रक्षा होती है और राक्षसी शक्ति, होलिका, नष्ट हो जाती है।

इस पर्व से जुड़ी अन्य कथाएँ भी अत्यधिक रोचक और धार्मिक महत्व की हैं। उत्तर-पूर्व भारत में यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस के रूप में मनाया जाता है। वहीं दक्षिण भारत में इसे भगवान शिव के द्वारा कामदेव को भस्म करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जो न केवल धार्मिक उत्सव, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत भी प्रस्तुत करता है।

होली के अवसर पर देशभर में सांस्कृतिक और लोक उत्सवों की धूम होती है। महानगरों में होली मिलन समारोह, संगीत और नृत्य के कार्यक्रमों के साथ मनाए जाते हैं, जो इस पर्व को और भी उल्लासपूर्ण बना देते हैं। घूमर, डांडिया, चंग की धुंकार और सामूहिक भोज जैसे आयोजनों से यह पर्व न केवल आनंदित करता है, बल्कि सभी को एकजुट करने का भी काम करता है।

मथुरा और वृन्दावन में होली का एक अलग ही माहौल होता है, जो केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ की होली में श्रीकृष्ण की लीलाओं का विशेष प्रभाव होता है, और इस दिन मंदिरों में होली की पूजा और रंग खेलना एक दिव्य अनुभव प्रदान करता है। वृन्दावन में यह पर्व विशेष रूप से भक्तों और पर्यटकों के लिए एक अद्भुत अनुभव बनता है, जहाँ रंगों के साथ भक्ति का भी संगम होता है।

होली का त्योहार एकता, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है। जब इस दिन अमीर-गरीब, उच्च-नीच, सभी भेद मिटाकर एक साथ रंगों में रंग जाते हैं, तब हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में शांति, प्रेम और सद्भावना का पालन करें। होली की आग में हमारी सारी चिंताएँ, द्वेष और पीड़ाएँ जलकर नष्ट हो जाएं और जीवन में खुशियाँ और आनंद का रंग बिखर जाए।

इसी प्रकार, होली न केवल रंगों का त्यौहार है, बल्कि यह जीवन को एक नया रंग देने का अवसर है।

प्रदीप ढेडिया – लेखक समर्पण ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं आनंद लिमिटेड के निदेशक हैं

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