इतिहास के पन्नों में 19 अगस्तः भारत में एक रुपये का पहला सिक्का 266 साल पहले जारी किया गया

देश-दुनिया के इतिहास में 19 अगस्त की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। यह तारीख भारत में सिक्कों के इतिहास की कथा समेटे है। आज से 266 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने 19 अगस्त को ही एक रुपये का सिक्का जारी किया था। इसे भारत का पहला सिक्का कहा जाता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी शुद्ध व्यापारिक थी। कंपनी एशिया में सिल्क, कॉटन, नील, चाय और नमक का व्यापार करती थी। 1640 के आसपास कंपनी ने भारत में 23 फैक्टरी खोल ली थीं और यहां करीब 100 लोग काम करते थे। हालांकि कई सालों तक कंपनी का भारत के शासन-प्रशासन में कोई दखल नहीं था। साल 1757 में प्लासी के युद्ध में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में शासन के अधिकार भी आने शुरू हो गए।

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प्लासी युद्ध में जीत के बाद कंपनी ने बंगाल के नवाब के साथ एक संधि की। इस संधि में कंपनी को सिक्के बनाने का अधिकार मिल गया। कंपनी ने कोलकाता में टकसाल खोली। इसके बाद 19 अगस्त 1757 को एक रुपये का पहला सिक्का जारी किया गया। कंपनी ने इससे पहले सूरत, बॉम्बे और अहमदाबाद में भी टकसाल की स्थापना की थी, लेकिन एक रुपये का सिक्का पहली बार कोलकाता में ही बनाया गया। सूरत टकसाल की स्थापना सबसे पहले की गई थी, लेकिन वहां डिमांड के मुताबिक सिक्के नहीं बन पा रहे थे। इसलिए 1636 में अहमदाबाद में टकसाल की स्थापना की गई। 1672 में बॉम्बे में भी सिक्के बनाने की शुरुआत हुई। बॉम्बे में यूरोपियन स्टाइल के गोल्ड, सिल्वर और कॉपर के सिक्के बनाए जाते थे। गोल्ड के सिक्कों को कैरोलिना, सिल्वर के सिक्कों को एंजलीना और कॉपर के सिक्कों को कॉपरून कहा जाता था।

हालांकि अभी तक पूरे भारत में एक जैसे सिक्कों का चलन नहीं था। बंगाल, मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में अलग-अलग तरह के सिक्के चलते थे। इनका आकार, वजन और वैल्यू भी अलग-अलग होती थी। व्यापार के लिए ये बड़ी समस्या थी। इसलिए 1835 में यूनिफॉर्म कॉइनेज एक्ट पारित किया गया। इस एक्ट के लागू होने के बाद एक जैसे सिक्के जारी किए जाने लगे। इन सिक्कों पर एक तरफ ब्रिटिश किंग विलियम चतुर्थ का हेड छपा होता था और दूसरी तरफ इंग्लिश और पर्शियन में सिक्का कितनी कीमत का है, ये छपा होता था। 1857 के विद्रोह के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के पास चला गया। इसके बाद सिक्कों पर ब्रिटिश मोनार्क की तस्वीर छपने लगी। पहले विश्वयुद्ध में चांदी की कमी होने की वजह से कागज के नोट जारी किए गए। 1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन 1950 तक यही सिक्के देश में चलते रहे।

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