लोकसभा चुनाव में बंगाल में भ्रष्टाचार और प्रति व्यक्ति 59 हजार का कर्ज होगा अहम मुद्दा

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कोलकाता : केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने लोकसभा के आगामी चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 35 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा चुनावों की तैयारी भी पश्चिम बंगाल से शुरू की है। भाजपा ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इधर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपना मैदान बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगी। यह देखना बाकी है कि क्या भाजपा भ्रष्टाचार और कई केंद्रीय एजेंसियों की जांच के मुद्दे पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक वर्चस्व को खत्म करने में सक्षम होगी या ममता का जादू फिर से काम करेगा, जैसा कि 2021 के विधानसभा चुनावों में हुआ था। लोकसभा चुनाव में कई ऐसे मुद्दे हैं जो खासकर अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं। इनमें एक बंगाल सरकार का नियमित हो रहा वित्तीय घाटा है। आश्चर्यजनक बात ये है कि राज्य सरकार ने इतना अधिक कर्ज ले रखा है कि हर व्यक्ति पर 59 हजार रुपये का कर्ज है।

लोकसभा चुनाव के साथ ही मनी लॉन्ड्रिंग के विभिन्न मामलों में विशेष रूप से स्कूलों में नौकरी के लिए करोड़ों रुपये की नकदी मामले में सीबीआई और ईडी की जांच की प्रगति पर सभी की नजर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगले कैलेंडर वर्ष के पहले चार महीने यानी लोकसभा चुनाव से पहले की अवधि केंद्रीय एजेंसियों द्वारा भ्रष्टाचार मामलों की जांच के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल नौकरी घोटाले के सभी मामलों को कलकत्ता हाई कोर्ट में वापस भेजते हुए यह स्पष्ट किया है कि वह हाई कोर्ट की विभिन्न पीठों के अंतिम फैसले तक इस मामले में कोई और हस्तक्षेप नहीं करेगा।

वर्तमान में क्रिसमस और साल के अंतिम सप्ताह के कारण कलकत्ता हाई कोर्ट में अवकाश है, लेकिन चूंकि अदालतें दो जनवरी से काम फिर से शुरू कर देंगी, इस मामले में न्यायमूर्ति देवांग्शु बसाक और न्यायमूर्ति शब्बीर रशीदी की खंडपीठ के साथ-साथ न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की एकल में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है। दूसरा सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाई कोर्ट दोनों ने स्कूल नौकरी मामले में अपनी जांच पूरी करने के लिए सीबीआई और ईडी के लिए समय सीमा तय की है और अधिकारी अपनी समय सीमा को पूरा करने के लिए 24 घंटे काम कर रहे हैं। दोनों एजेंसियों के वकीलों ने अदालतों को सूचित किया है कि जांच अंतिम चरण में है और जल्द ही समाप्त हो जाएगी।

फोकस का एक और मुद्दा सरकारी खजाने की खराब स्थिति होगी। भारतीय रिजर्व बैंक के नवीनतम निष्कर्षों के अनुसार, पश्चिम बंगाल के स्वयं के कर राजस्व से सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) प्रतिशत के मामले में राष्ट्रीय औसत से पीछे है। यह राष्ट्रीय औसत सात की तुलना में पांच प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल में गैर कर राजस्व के मामले में स्थिति और भी दयनीय है। रिजर्व बैंक के अनुसार, राज्य के गैर-कर राजस्व का जीएसडीपी में हिस्सा महज 0.4 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 1.2 फीसदी से कम है।

जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पश्चिम बंगाल सरकार का वर्तमान खर्च केवल दो प्रतिशत है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार के 2024-24 के बजट दस्तावेजों के अनुसार, राज्य का संचित ऋण 31 मार्च 2024 तक बढ़कर छह लाख 47 हजार 825.52 करोड़ रुपये हो जाएगा। यह दस प्रतिशत है। 31 मार्च 2023 तक यह आंकड़ा पांच लाख 86 हजार 124.63 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। एक तरीके से देखा जाए तो इसी अवधि के लिए राज्य का प्रति व्यक्ति ऋण बढ़कर 59 हजार रुपये हो गया है। तो अब यह देखना बाकी है कि इन सभी कारकों का आगामी लोकसभा चुनाव में ममता सरकार पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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