■ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से पूर्व पेश हुआ ‘Unveiling the Silent Struggle’ डेटा
■ कोलकाता डेटा हाइलाइट्स: उच्च स्तर का अकादमिक तनाव और कॉर्पोरेट बर्नआउट
कोलकाता : महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य गंभीर संकट में है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में आत्महत्या करने वालों में 36.6% महिलाएं हैं, जिनमें 18-39 वर्ष की युवतियां सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसके बावजूद समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर फैले डर और कलंक के कारण महिलाएं मदद लेने से बचती हैं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एमपावर, जो आदित्य बिड़ला एजुकेशन ट्रस्ट की पहल है, ने ‘Unveiling the Silent Struggle’ नामक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट देशभर की 13 लाख महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य आंकड़ों पर आधारित है। इसमें कॉलेज छात्राओं, कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स, ग्रामीण महिलाओं और सेना में कार्यरत महिलाओं की मानसिक चुनौतियों को उजागर किया गया है।
डॉ. प्रीति पराख (मनोचिकित्सक एवं प्रमुख, Mpower – The Centre, कोलकाता) ने कहा, “कोलकाता एक ऐसा शहर है जहाँ परंपरा और आधुनिकता सह-अस्तित्व में हैं, और महिलाएँ अक्सर दोनों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। परिवार, काम और तेजी से बदलते समाज की माँगों के बीच, उनके मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। चिंता, अवसाद और दीर्घकालिक तनाव जैसी स्थितियाँ बढ़ते प्रभाव के बावजूद अभी भी कम पहचानी जाती हैं। मैं महिलाओं से आग्रह करती हूँ कि वे अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर सहायता लें और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मौन को तोड़ें। सहायता माँगना कमजोरी का संकेत नहीं है, बल्कि सशक्तिकरण और लचीलेपन की दिशा में एक कदम है।”
मुख्य निष्कर्ष:
🔹 50% महिलाएं वर्क-लाइफ बैलेंस, आर्थिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं से तनाव में हैं।
🔹 47% महिलाओं को नींद न आने की समस्या है, खासकर 18-35 आयु वर्ग में।
🔹 41% महिलाएं भावनात्मक रूप से अकेलापन महसूस करती हैं।
🔹 38% छात्राएं और कामकाजी महिलाएं करियर ग्रोथ और वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंतित हैं।
ग्रामीण महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य:
महाराष्ट्र सरकार के साथ ‘प्रोजेक्ट संवेदना’ के तहत 12.8 लाख ग्रामीण महिलाओं पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि वित्तीय अस्थिरता, सामाजिक कलंक और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण वे गंभीर अवसाद और चिंता से जूझ रही हैं।
कॉरपोरेट जगत में कामकाजी महिलाएं:
🔹 42% महिलाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी के लक्षण पाए गए।
🔹 80% महिलाएं मातृत्व अवकाश और करियर ग्रोथ में भेदभाव झेलती हैं।
🔹 90% महिलाओं का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का उनके कार्य प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ता है।
सेना में कार्यरत महिलाएं:
🔹 PTSD और मानसिक आघात के मामलों में वृद्धि देखी गई।
🔹 मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर खुलकर बात करने से डरती हैं ताकि करियर पर असर न पड़े।
🔹 यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और वर्क-लाइफ बैलेंस बड़ी चुनौतियां हैं।
शहरवार मानसिक स्वास्थ्य प्रवृत्तियां (18-35 वर्ष आयु वर्ग):
◆ मुंबई – एकेडमिक स्ट्रेस और कॉरपोरेट बर्नआउट अधिक।
◆ दिल्ली – सुरक्षा चिंताओं और उत्पीड़न के कारण PTSD और एंग्जायटी अधिक।
◆ कोलकाता – मजबूत सामाजिक नेटवर्क के बावजूद मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी।
महिला मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेषज्ञों की सिफारिशें:
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राइमरी हेल्थकेयर सिस्टम में शामिल किया जाए।
- सरकार मानसिक स्वास्थ्य को महिलाओं के सार्वजनिक स्वास्थ्य का अहम हिस्सा बनाए।
- गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मानसिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य हो।
- कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता कार्यक्रम लागू किए जाएं।
- महिलाओं के लिए गोपनीय और सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
- लड़कियों को कम उम्र से मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा दी जाए।
महिलाओं को घर और समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने का अवसर मिले। - मीडिया के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता बढ़ाई जाए।
एमपावर महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और इससे जुड़ी रूढ़ियों को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। इस रिपोर्ट के आधार पर नीति निर्माण, कॉरपोरेट हस्तक्षेप और राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाएगा।